(अमित तिवारी) : "रमइया" एक अभागी जाति- जिसे आज तक नहीं मिली संवैधानिक पहचान, यूपी सरकार ने जातीय अनुसूची में किया संशोधन.. रमइयाओं का संघर्ष एक बार फिर दरकिनार।



कासगंज: यूपी सरकार ने आज जातीय अनुसूची में संशोधन किया है, जहां कासगंज के सोरों जी में रह रमइया जाति को अभी तक संवैधानिक पहचान नहीं मिल सकी है, आज़ादी के बाद से यह जाति त्रुटिवश जातीय अनुसूची में दर्ज होने से छूट गयी थी, जिसके बाद से आज तक इस जाति के लोग अपनी जातीय पहचान पाने के लिए पिछले कई दशकों से संघर्ष कर रहे है, पूरे विश्व में अनुमानित 3 हज़ार से अधिक जातियां व 25 हज़ार से अधिक उपजातियां लिस्टेड हैं वहीँ हमारे भारत वर्ष में 34 प्रमुख जातियों व 248 से अधिक प्रमुख उपजातियों व 3000 से अधिक अंतर्विवाही जातियों का जिक्र मिलता है, परन्तु कासगंज जनपद के सोरों जी में निवास कर रही लगभग 15 सौ संख्या की आबादी बाली रमइया जनजाति का जिक्र दुनिया के सबसे बड़े वेब सर्च इंजन गूगल पर भी नहीं मिलता है, इस देश के तमाम धर्म और इस देश का समूचा सरकारी सिस्टम जो कि इस रमइया जनजाति को आज भी आधिकारिक तौर पर मान्यता प्रदान नहीं करता है, सोरों में रहने वाले व अधिकतर सिख धर्म के अनुयायी बन चुके इस जाति के लोगों को यहां की सरकार इनकी मूल जाति रमइया जनजाति के नाम से जाति प्रमाणपत्र भी निर्गत नहीं करती है, पिछले सेकड़ों वर्षो से आज भी इस जनजाति लोग अशिक्षा गरीबी भुखमरी और खानाबदोश की जिंदगी गुजर बसर कर रहे हैं, सोरों के बदरिया में रह रहे इस जनजाति के लोगों की अनुमानित आबादी 15 सौ के आसपास है, जिनमें 90 फीसदी लोग आज भी अशिक्षित हैं, वहीं इस जनजाति की महिलाएं तो 100 प्रतिशत अशिक्षित हैं। अशिक्षा और गरीबी के चलते इस जनजाति के लोग भिक्षावृत्ति और गैरकानूनी व्यापार की ओर जा रहे हैं, सोरों व आसपास के स्थानीय लोग इन्हें खटपटिया जाति के रूप में पहचानते हैं, वो इसलिए क्योंकि कुछ वर्ष पूर्व तक इस जनजाति के अधिकतर लोग हाथ में खटपटी लेकर गंगा किनारे भजन गीत गा गा कर भिक्षा मांगते रहे थे, सोरों जी में रह रहे इस जनजाति के सबसे उम्रदराज व्यक्ति नानक जी व राजेश कौर एवं करन सिंह ने हमें बताया कि वो मूल रूप से राजस्थान व् पाकिस्तान के सीमावर्ती इलाके से हैं, जो 18 वीं शताब्दी में राजा जस्सा सिंह राम गढ़िया के साथ मुगलों के विरुद्ध लड़ाई लड़ते लड़ते यमुना गंगा के मैदानों में आ बसे, वो पिछले सेकड़ों वर्षों से सोरों जी में रह रहे हैं, पिछले 3 सौ सालों से वो सिख धर्म के अनुयायी हैं, पर उनकी यह रमइया जनजाति न हिन्दू धर्म के अंतर्गत में लिस्टेड है और न ही सिख धर्म के अंतर्गत। देश भर में रमइया जनजाति के लोगों की अनुमानित आबादी 1 लाख के आसपास हो सकती है, सरकार की जातीय अनुसूची में रमइया जनजाति का जिक्र न होने के चलते कई ने तो अपना धर्म परिवर्तन कर लिया तो कई ने अपनीं जातियां, एक युवक ने हमें बताया कि उसका जाति प्रमाण पत्र तो खटीक जाति के नाम पर बना दिया गया है, तो दूसरे युवक ने बताया कि उसका जाति प्रमाण पत्र सामान्य वर्ग में बना दिया गया है, यह एक ऐतिहासिक बिडम्बना है कि एक जनजाति के इतनी बड़ी संख्या में लोग अपने मूल जातीय पहचान के लिए सेकड़ों वर्षों से आज भी संघर्ष कर रहे हैं।

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