(अमित तिवारी)- भगवान परुषराम का धनुष दान में लेकर पटियाली में अभ्यास करते थे गुरु द्रोणाचार्य।





भगवान परुषराम का धनुष दान में लेकर पटियाली में अभ्यास करते थे गुरु द्रोणाचार्य।

(अमित तिवारी) पटियाली।  पौराणिक अनुश्रुतियों के अनुसार राजा द्रुपद और गुरु द्रोणाचार्य आपस में दोनों गुरु भाई व् बालसखा भी थे, शिक्षा दीक्षा ग्रहण करने के पश्चात द्रुपद तो अखंड पंचाल प्रदेश के राजा बन गए परन्तु गुरु द्रोणाचार्य अत्यंत गरीबी के दिन काट रहे थे, इस गरीबी के दौरान  ही गुरु द्रोणाचार्य का विवाह कृपाचार्य के बहन कृपी से हो गया था जिनसे एक पुत्र जनित हुआ जिसका नाम अश्वत्थामा था, गुरु द्रोणाचार्य की गरीबी के चलते कृपी अपने पुत्र अश्वत्थामा को लेकर अपने भाई कृपाचार्य के यहां कम्पिल पास स्थित गाँव कारब में ही रहा करतीं थीं। बाल अश्वत्थामा के अत्यधिक दुग्धपान के चलते कृपाचार्य ने द्रोणाचार्य से कहा कि वो अपने पुराने मित्र राज द्रुपद से कुछ गायें दान में ले आयें जिससे बाल अश्वत्थामा का पेट भरता रहे, इस सलाह पर द्रोणाचार्य और कृपाचार्य राजा द्रुपद के यहां पहुंचे और कहा कि वो उनके बालसखा हैं। राजा द्रुपद ने द्रोणाचार्य से कहा के एक राजा और एक निर्धन में कोई मित्रता नहीं होती। अपमानित होकर द्रोणाचार्य द्रुपद के महल से बापस लौट आये। 
नित्य प्रतिदिन द्रोणाचार्य अपने मित्र द्रुपद द्वारा किये गए अपमान का प्रतिशोध लेने को आतुर थे, परंतु वह अस्त्र शस्त्र हीन थे, एक समय द्रोणाचार्य को किसी से ज्ञात हुआ कि भगवान परुषराम अपने दिव्य एवं घातक अस्त्र शस्त्र सुयोग्यों को दान कर रहे हैं तो यह सुन द्रोणाचार्य उनके पास दौड़े चले गए, जब तक द्रोणाचार्य भगवान परुषराम के पास पहुंचे तब तक भगवान परुषराम अपने अधिकतर अस्त्र शस्त्र दान कर चुके थे और हिमालय की ओर जाने वाले थे, द्रोणाचार्य ने भगवान परुषराम से कोई भी दिव्य अस्त्र शस्त्र दान देने को कहा, भगवान परुषराम ने द्रोणाचार्य से कहा कि हे द्रोण अब तो मैं सभी अस्त्र शस्त्र दान कर चुका हूँ और हिमालय जाने की प्रतीक्षा में, अब मेरे पास केवल यह एक धनुष ही है, इसे आप ले जाओ, भगवान परुषराम का दिव्य धनुष प्राप्त कर द्रोणाचार्य अति प्रसन्न हुए और भगवान परुषराम को प्रणाम कर  बापस पटियाली लौट आये, पटियाली दुर्ग के पूर्वी भाग में एक गुरु टीला स्थान है, जहां द्रोणाचार्य ने भगवान परुषराम के दिव्य धनुष से निरंतर अभ्यास किया,
कुछ समय बाद भीष्म पितामह के साथ कौरब व् पांडव हस्तिनापुर से खेलते खेलते पटियाली पहुँच गए जहां उनकी भेंट गुरु द्रोणाचार्य से हुयी, गुरु द्रोणाचार्य से मिलकर भीष्म पितामाह काफी प्रभावित हुए और वो उन्हें अपने साथ राज्याश्रय में ले गए, गुरु द्रोणाचार्य ने बाल कोरवों व् पांडवों को अस्त्र शस्त्र की शिक्षा प्रदान की और गुरु दक्षिणा में राजा द्रुपद का राज्य माँगा। राजा द्रुपद को युद्ध में परास्त कर गुरु द्रोणाचार्य ने अपने अपमान का बदला लिया और उत्तरी पांचाल पर अपने पुत्र अश्वत्थामा को राजा नियुक्त किया जिसकी राजधानी पटियाली रही। 

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