(अमित तिवारी): अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस - 21 वीं सदी का मजबूर “मजदूर”




अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस - 21 वीं सदी का मजबूर “मजदूर”

किसी ने लिखा है कि ... नींद आएगी भला कैसे उसे शाम के बा ... रोटियां भी मयस्सर न हों जिसे काम के बाद, 
आज 1 मई को विश्वभर में प्रतिवर्ष की भांति पिछले 133 वर्षों से अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस का आयोजन हो रहा है,
पहली बार अंतर्राष्ट्रीय मज़दूर दिवस मनाने की शुरूआत 1 मई 1886 से मानी जाती है जब अमेरिका  की मज़दूर यूनियनों ने काम का समय 8 घंटे से अधिक न रखे जाने को लेकर हड़ताल की थी,
मजदूर का नाम आते ही अक्सर लोग इंसान को लगातार काम करने वाली एक मशीन के स्वरुप में देखते है, मामूली मजदूरी में कड़ी शारीरिक मेहनत का नाम मजदूरी है जो उसके परिवार का भरण पोषण करने की मजबूरी है, मजबूरी का नाम मजदूरी है,
शारीरिक मेहनत कर कमाना खाना कोई अभिशाप नहीं है परन्तु मेहनत का उचित मेहनताना न मिलना मजदूर के हितों की अनदेखी है,
कम मेहनताने में निर्धारित समय से अधिक मेहनत करवाना भी मजदूर के हितों की अनदेखी है,
दुर्घटना व मृत्यु के उपरांत अधिकतर मजदूरों के परिवारों को उचित मुआवजा न मिलपाना भी मजदूर के हितों की अनदेखी है,
भारत में मजदूरों के हितों को लेकर तमाम वैधानिक प्रावधान किये गए हैं जिनके क्रियांवानन के लिए प्रत्येक जनपद पर अधिकारियों की नियुक्ति की गई है, इतना सब होने के बावजूद भी मजदूर फिर मजबूर क्यों है, यह एक बड़ा नैतिक सवाल निरंतर बना हुआ है,



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