सोरों जी: होलिका इलोजी की प्रेम कहानी का दुखद अंत- अपनी बारात के ही दिन भतीजे प्रहलाद को अग्निरोधी कवच प्रदान कर अग्नि में भस्म हो गयी थी होलिका, विवाह अग्नि कुण्ड पर होलिका की राख देख चीत्कार उठे थे प्रेमी इलोजी।





सोरों जी: होलिका इलोजी की प्रेम कहानी का दुखद अंत- अपनी बारात के ही दिन भतीजे प्रहलादको अग्निरोधी कवच प्रदान कर अग्नि में भस्म हो गयी थी होलिका, विवाह अग्नि कुण्ड पर होलिका की राख देख चीत्कार उठे थे प्रेमी इलोजी

(अमित तिवारी) : होलिका को अग्नि में न जलने का वरदान व्रह्मा जी से प्राप्त था, वह नित्यदिन अग्नि स्नान करती थी, अगर हम पौराणिक कथाओं पर जरा ठीक से गौर करें तो यह अर्थ निकलकर आएगा कि अग्नि की उपासक होलिका खलनायिका नहीं थी वल्कि उसके भाई हिरण्यकश्य ने उसे विवश किया था कि वो विष्णु भक्त प्रह्लाद को लेकर प्रचंड अग्नि समूह में बैठ जाये अन्यथा उसी दिवस फाल्गुन की पूर्णिमा को होने वाले उसके प्रेम विवाह को वह नहीं होने देगा,
पौराणिक कथा किवदंतियों के अनुसार फाल्गुन की पूर्णिमा को सोरों जी में होलिका की बारात आना प्रस्तावित था, होलिका के भाई हिरण्यकश्य को इस विवाह पर आपत्ति थी,  इस दिन होलिका का प्रेम विवाह राजस्थान के लोक देवता कामदेव के स्वरुप राजा इलोजी नासितक से होना था, इधर हिरण्यकश्य अपने विष्णु भक्त पुत्र प्रहलाद से अत्यधिक खिन्न था, बारात आने से ठीक पहले ही होलिका के भाई हिरण्यकश्य ने होलिका से कहा कि वो प्रहलाद को लेकर अग्नि कुण्ड में बैठ जाये अन्यथा वह उसका विवाह संम्पन्न नहीं होने देगा, होलिका अपने भतीजे प्रहलाद से अत्यधिक स्नेह व राजस्थान के लोक देवता इलोजी से अत्यधिक प्रेम करती थी, होलिका दोनों में से किसी को खोना नहीं चाहती थी, इसलिए होलिका ने स्वयं के ही जीवन को समाप्त करने का निर्णय लिया और अग्नि कुण्ड में बैठकर प्रह्लाद को अपना अग्निरोधी कवच प्रदान कर दिया, इस कारण अग्नि की उपासक होलिका जल गयी वहीं प्रहलाद सुरक्षित बच गया,
उसी दौरान  होलिका के प्रेमी इलोजी ने अपनी बारात के साथ सोरों जी में प्रवेश किया, इलोजी देखा कि कि उनकी प्रेयसी होलिका विवाह अग्नि कुण्ड में जलकर भस्म हो चुकी है, विवाह अग्नि कुण्ड पर अपनी प्रेयसी होलिका की राख देखकर प्रेमी इलोजी चीत्कार उठे, इलोजी ने अपने शरीर के वस्त्रों को फाड़ डाला और अग्नि में जल हो चुकी होलिका की अवशेष भस्म को दोनों हाथों से अपने शरीर पर पोतने लगे,
होलिका और इलोजी की प्रेम कहानी का यह एक दुखद अंत था, वातावरण में स्तब्धता शून्यता छा चुकी थी, होलिका के वियोग में मानसिक रूप से विचलित होते जा रहे निढाल इलोजी को लेकर उनकी बारात बापस राजस्थान लौट गयी,
कहा जाता है कि होलिका के वियोग में इलोजी आजीवन अविवाहित रहे, होलिका के शरीर की अवशेष भस्म को आजीवन वह अपने शरीर पर लपेटे रहे,
किवदंती है कि इलोजी की मृत्यु नहीं हुयी है और वह वह आज भी जीवित हैं
प्रतिवर्ष फाल्गुन पूर्णिमा होलिका दहन के समय राजस्थान के कुछ भूभाग में इलोजी की बारात निकलती है, बांझ स्त्रियां संतान प्राप्ति के लिए देवता इलोजी की पूजा करतीं हैं,      

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