अग्नि की उपासक होलिका सोरों जी के अधिपति हिरण्यकश्यप और हिरण्याक्ष की बहन व भक्त प्रहलाद की बुआ थी।







अग्नि की उपासक होलिका सोरों जी के अधिपति हिरण्यकश्यप और हिरण्याक्ष की बहन व भक्त प्रहलाद की बुआ थी। 



(अमित तिवारी) सोरों/कासगंज। स्रष्टि के प्रारंभ काल से ही सोरों जी मानव सभ्यता का प्रमुख प्रशासनिक व धार्मिक केंद्र रहा हैसोरों जी की धरती अनगिनत देवताओं राजाओं साहित्यकारों की तपोभूमि प्रवासभूमि प्रशासनिक भूमि व जन्मभूमि रही हैशायद अधिकतर स्थानीय निवासियों को यह नहीं पता होगा कि पूरे भारतवर्ष में जिस होलिका का प्रतिवर्ष फागुन मास की पूर्णिमा तिथि को दहन होता है,उस  मैया होलिका का जन्म तीर्थ नगरी सोरों जी में ही हुआ था,
विष्णुपुराण व् पद्मपुराण के अनुसार  आज से लाखों वर्ष पूर्व सतयुग काल में मैया होलिका भू-स्वामी व सोरों जी शूकर क्षेत्र का अधिपति दैत्यराज हिरण्यकश्यप और  हिरण्याक्ष की बहन व भगवान विष्णु भक्त  प्रहलाद की बुआ थीहोलिका का जन्म सोरों जी में ही हुआ था,
अनुश्रुति कथाओं के अनुसार आदि कश्यप ऋषि व उनकी दूसरी पत्नी दिति की तीन संतान हुयीं जिनमें दो पुत्र हिरण्यकश्यप और हिरण्याक्ष व एक पुत्री होलिका का सन्दर्भ मिलता है, अग्नि उपासक होलिका को व्रह्मा जी से अग्नि में न जलने का वरदान प्राप्त था,
होलिका प्रतिदिन अग्नि स्नान करती थीएक समय बाद भगवान वराह ने होलिका के भाई हिरण्याक्ष का वध कर दियातत्पश्चात होलिका का दूसरा भाई और सोरों जी का राजा हिरण्यकश्यप जो कि भगवान विष्णु का सबसे बड़ा शत्रु बन गया,हिरण्यकश्यप ने अपने राज्य में भगवान विष्णु की आराधना प्रतिबंधित कर दीवर्षों पश्चात् हिरण्यकश्यप का अपना पुत्र प्रहलाद ही भगवान विष्णु का अखंड भक्त हो गयायह जानकार हिरण्यकश्यप बेहद क्रोधित हो उठा और उसने अपनी बहन होलिका को आदेश दिया कि वह प्रहलाद को लेकर अग्नि में बैठ जायेहिरण्यकश्यप के आदेशानुसार होलिका अपने भतीजे प्रह्लाद को लेकर अग्नि में बैठ गयीभक्त प्रहलाद की विष्णु भक्ति के समक्ष होलिका को व्रह्मा जी द्वारा दिया गया वरदान काम न आयाहोलिका जल गयी और प्रह्लाद सुरक्षित बच गया,
आदिकाल से इस दिन को होलिका दहन के रूप में मनाया जाता हैपौराणिक मान्यता है कि होली के दिन अग्नि के फेरे लेने से नकारात्मक शक्तियों का नाश होता है,

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