ब्राह्मण और प्रेत संवाद प्रसंग कथा


ब्राह्मण और प्रेत संवाद प्रसंग कथा



अमित तिवारी। श्री वराह पुराण एक अध्याय में मैंने प्राचीन पौराणिक परालौकिक प्रसंग पढ़ा जिसमें तीर्थ यात्रा के दौरान वन में एक ब्राह्मण और पांच प्रेतों के बीच हुए रोचक संवाद का वर्णन है।
इस प्रसंग कथा के अनुसार महानाम वन में एक महानाम संज्ञक एक योगी ब्राह्मण रहता था, एक बार वह ब्राह्मण मथुरा की तीर्थ यात्रा के लिए निकला, मार्ग में उस ब्राह्मण को पांच विकराल प्रेत मिले, यह देख ब्राह्मण ने उन प्रेतों से पूंछा कि इतने भयंकर रूप वाले आप लोग कौन हो,
ब्राह्मण के इस प्रश्न पर प्रथम प्रेत बोला कि हम प्रेत हैं और हम पंचों के  नाम क्रमशः पर्युषित, सूचीमुख, शीघ्रग, रोधक और लेखक है। 
यह सुनकर ब्राह्मण ने उन प्रेतों से पूंछा कि आपके इन विचित्र नामों का क्या अर्थ है, उत्तर में प्रेत बोला इनमें से जो जीवन के दौरान जो स्वंय स्वादिष्ट भोजन कर ब्राह्मणों को बासी भोजन अन्न दिया करता था तो उसका नाम पर्युषित पड़ा, यह दूसरा प्रेत ब्राह्मणों का उपहास कर उनकी की हत्या कर देता था इसलिए इसका नाम सूचीमुख पड़ा, यह तीसरा प्रेत सामर्थ्यवान होते हुए भी याचकों को दान न देकर चला जाता था इसलिए इसका नाम शीघ्रग पड़ा, चौथा प्रेत बिना कुछ काम धाम किये उद्गिन होकर घर में बैठा रहता था इसलिए इसका नाम रोधक पड़ा, पांचवां याचकों की याचना पर मौन रहता और बैठा बैठा प्रथ्वी पर लकीरें खींचता रहता था तो इस अभिमानी का नाम लेखक पड़ा,
इसलिए इस पाप से हमारी यह स्थिति हुयी, ब्राह्मण से प्रेत बोला कि हे विप्र इसके अतिरिक्त अन्य कुछ पूंछना हो तो पूंछो।

अगले प्रश्न में ब्राह्मण ने प्रेतों से कहा कि प्रथ्वी पर सभी प्राणियों का जीवन आहार पर है, अतः आप प्रेतों का आहार क्या है।
ब्राह्मण के इस प्रश्न के उत्तर में प्रेत बोले कि हे ब्राह्मण मेरे आहार के बारे में जानकर आपको घ्रणा होगी, परन्तु सुनिए, जिन घरों में सफाई नहीं होती, स्त्रियाँ जहां थूक खकार देंतीं हैं और मॉल मूत्र जहां यत्र तत्र पड़ा रहता है, जिस घर में लोग मन्त्र नहीं पढ़ते, जिन घरों में दान धर्म नहीं होता, जिन घरों में गुरुजनों की पूजा नहीं होती, जिन घरों में झूठा अन्न बिखरा पड़ा रहता है, जिस घर में परस्पर क्लेश रहती हो, हम प्रेत उन घरों से ही भोजन प्राप्त करते हैं।

संवाद के अगले क्रम में प्रेतों ने ब्राह्मण से पूंछा के हे विप्र तुम हमें बताओ कि मनुष्य ऐसा कौन सा काम करे जिससे उसे प्रेत योनि में न जाना पड़े,
ब्राह्मण ने प्रेतों से कहा कि हे प्रेत, एकरात्रि, त्रिरात्री, चान्द्रायन, कृच्छ, अतिकृच्छ आदि व्रत करने से प्रेत योनि नहीं मिलती, जो श्रद्धापूर्वक दान करते हैं, जो साधुओं का सम्मान करते हैं, जो ब्रक्षों में नियमित जलदान करते हैं, जो सम्पूर्ण जीवों पर दया करते हैं, जो देवता अतिथि गुरु पितरों की नित्य पूजा करते हैं, जो क्रोध पर नियंत्रण रख उदार सदा संतुष्ट आसक्तिशून्य क्षमाशील हो, जो व्यक्ति एकादशी सप्तमी चतुर्दशी तिथियों का उपवास रखता हो,
जो व्यक्ति गौ ब्राह्मण साधू संत गुरुओं विद्वानों तीर्थ पर्वत नदी भोजन देवताओं माता पिता को नित्य नमस्कार करता हो, जो व्यक्ति पाखंड मांसाहार मदिरापान न करता हो, जो व्यक्ति धन लेकर कन्यायों का क्रय विक्रय न करता हो, तो ऐसे मनुष्य प्रेत योनि में जाने से बच जाते हैं।

भगवान वराह कहते हैं कि हे वसुंधरे, वह ब्राह्मण इस प्रकार ही कह रहा था कि अचानक आकाश में दुन्दुभियाँ बज उठीं और आकश से पुष्प वृष्टि होने लगी, साथ ही उन प्रेतों के लिए चरों ओर विमान खड़े हो गए, देवदूतों ने प्रेतों से कहा कि इस ब्राह्मण के साथ वार्तालाप करने व पुण्यमय चरित्र सुनने से  तुम पांचो प्रेत अब इस प्रेत योनि से मुक्त होने जा रहे हो।
उन पांचो प्रेतों को प्रेत योनि से मुक्ति देने वाला यह प्रसंग सम्पूर्ण धर्मों का राजतिलक है, जो परम भक्ति के साथ तत्परतापूर्वक इस चरित्र को पढता सुनता व अनुसरण करता है वह प्रेत नहीं होता।   

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