दरियावगंज के निकट है ऋषि मार्कन्डेय का आश्रम और सतयुग कालीन शिवलिंग,


दरियावगंज के निकट है ऋषि मार्कन्डेय का सतयुगी आश्रम,



(अमित तिवारी) कासगंज जनपद मुख्यालय से पूर्व दिशा की ओर लगभग 55 किलोमीटर की दूरी पर स्थित दरियावगंज से पूर्व ही एक विशाल सरोवर मौजूद है जो बूढ़ी गंगा सभ्यता का एक प्रमुख भौगोलिक हिस्सा माना जाता है, मान्यता है कि सतयुग में इस सरोवर के निकट एक घना जंगल था, इस सरोवर और इस जंगल में ऋषि मार्कन्डेय का आश्रम था,

पद्म पुराण के अनुसार भृगु ऋषि के पुत्र का नाम मृकण्डु मुनि था, मृकण्डु मुनि और उनकी पत्नी मरुद्दती पटियाली और कम्पिल के बीच दरियावगंज के घने जंगल में सरोवर के पास ही एक स्थान पर रहते थे, मृकण्डु मुनि के कोई संतान नहीं थी इसलिए उन्होंने संतान प्राप्ति के लिए भगवान शिव की कठोर तपस्या की, तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव मृकण्डु मुनि के समक्ष साक्षात प्रकट हुए और कहा कि हे मुनि आपके भाग्य में संतान प्राप्ति का योग नहीं है फिर भी मैं आपको एक पुत्र प्राप्ति का वरदान देता हूँ, परन्तु इस पुत्र की आयु केवल सोलह वर्ष ही होगी, कुछ समय पश्चात मृकण्डु मुनि की पत्नी मरुद्दती ने एक तेजस्वी पुत्र को जन्म दिया जिसका नाम मार्कन्डेय रखा गया, जन्म के कुछ समय बाद ही मार्कन्डेय को ऋषि मुनियों के पास आश्रम में भेज दिया गया, पद्मपुराण के अनुसार कुछ वर्ष के बाद जब मार्कन्डेय अपने माता पिता से मिलने पहुंचे तो उन्होंने अपने माता पिता से कहा कि उन्हें सप्तऋषियों ने आयुष्मान भव का आशीर्वाद दिया है और इतना ही नहीं वो सप्त ऋषि उन्हें परमपिता व्रह्मा से से भी मिलवाने ले गए थे जहां उन्हें व्रह्मा जी ने चिरायुर्भव पुत्र का आशीर्वाद दिया है, बालक मार्कन्डेय की यह बात सुन पिता मृकण्डु मुनि व माता मरुद्दती थोड़ी प्रसन्न तो हुईं परन्तु पुत्र मार्कन्डेय की अल्पम्रत्यु का भय उनके मन से पूर्णतः नहीं निकल रहा था, अपने माता पिता को निरंतर चिंतित देख मार्कन्डेय ने माता पिता से उन्होंने इस बारे में जब विस्तृत वार्ता की तो पता चला कि उनकी अर्थात मार्कन्डेय की 16 वर्ष की आयु में ही मृत्यु हो जाएगी,
अपनी अकाल मृत्यु को टालने के लिए मार्कन्डेय दरियावगंज के निकट ही अपने आश्रम में लौट आये और इसी आश्रम में एक शिवलिंग को अभिमंत्रित कर स्थापित किया था, शिवलिंग के समक्ष बैठकर मार्कन्डेय कठोर साधना में लीन हो गए, दरियावगंज के निकट इस आश्रम में ही ऋषि मार्कन्डेय ने स्रष्टि के सबसे चमत्कारी मन्त्र महाम्रत्युन्जय मंत्र की रचना की, तप साधना करते करते ऋषि मार्कन्डेय की मृत्यु का समय निकट आ चुका था,  ऋषि मार्कन्डेय के प्राण लेने यमराज आश्रम में जा पहुंचे, यमराज को देख मार्कन्डेय ऋषि ने अपने द्वारा स्थापित शिवलिंग को दोनों हाथों से जकड़कर अपने द्वारा ही रचित महाम्रत्युन्जय मंत्र का जाप करना प्रारम्भ कर दिया, इसी बीच यमराज ने मार्कन्डेय की तरफ एक फंदा फेंका जिसमें मार्कन्डेय के साथ शिवलिंग भी फांस में आ गयी, यह देख भगवान शिव अचानक प्रकट हुए और यमराज पर क्रोधित होकर उन्हें वहां से चले जाने के लिए कहा, यह देख यमराज भयभीत होकर मार्कन्डेय ऋषि के बिना प्राण हरण किये आश्रम से चले गए, इस प्रकार मार्कन्डेय ऋषि को अकाल मृत्यु से जीवन दान मिला, मान्यता है कि मार्कन्डेय ऋषि आज भी जीवित हैं और दरियावगंज के निकट इसी आश्रम में अद्रश्य स्वरुप में रहते हैं, 



  

इस आश्रम कीं सेवादार माता कमला ने हमें बताया कि वह जब भी किसी कारण से चिंतित होतीं हैं तो ऋषि मार्कन्डेय का वह अपने आसपास स्वेत वर्ण स्वरुप में व जमीन पर फैली विशाल जटाओं वाली एक दिव्य आकृति की वह अक्सर अनुभूति करतीं हैं, 

इस दिव्य आश्रम के बारे में और विस्तार से जानने के लिए हमने माता कमला से बात की उन्होंने हमें बताया कि कुछ वर्ष पूर्व ही इस परिसर का पुनर्निर्माण हुआ है, इस पुनर्निर्मित वर्तमान मंदिर की नींव सतयुग कालीन पत्थरों पर ही टिकी है,
इस आश्रम के शिवलिंग मार्कन्डेय ऋषि द्वारा ही स्थापित किया गए थे,  इस आश्रम की महत्ता के बारे में चन्द लोग ही जानते हैं,



मान्यता है कि इस आश्रम में महाम्रत्युन्जय मन्त्र की स्तुति करने से यमराज भी खाली हाथ लौट जाते हैं,

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