भीमसेन का घंटा देखने पहुंचे नोडल अधिकारी रंजन कुमार व जिलाधिकारी आर पी सिंह।

भीमसेन का घंटा देखने पहुंचे नोडल अधिकारी रंजन कुमार व जिलाधिकारी आर पी सिंह।


(अमित तिवारी) कासगंज। गुरुवार दोपहर लखनऊ से जनपद कासगंज में विकास कार्यों की समीक्षा करने आये नोडल अधिकारी रंजन कुमार (सचिव लोकनिर्माण विभाग उत्तर प्रदेश सरकार) जो कि दोपहर बाद कासगंज शहर के निकटवर्ती नदरई स्थित 194 वर्षों से चर्चित भीमसेन का घंटा देखने पहुंचे।



आपको बताते चलें कि आज से ठीक 194 साल पहले हुए एंगलो बर्मी युद्ध में  नदरई निवासी रिसालदार भीमसेन तिवारी ने फर्स्ट ऐंग्लो बर्मी वार के दौरान बर्मा के कॉगवांग राजवंश को धूल चटाई थी। युद्ध में कॉगवांग के किले से छीने गये अष्टधातु के बड़े और भारी घंटे को बिटिश सेना ने इनाम बतौर रिसालदार भीमसेन को सौंपा था। यह घंटा आज भी कासगंज के नदरई गांव के मंदिर में एंगलो बर्मी युद्ध का साक्षी है। 
कासगंज से पश्चिम में महज तीन किलोमीटर की दूरी पर बसा गांव नदरई अंग्रेज शासनकाल में बेहद महत्वपूर्ण स्थान था। कॉगवांग के राखिन स्टेट के इतिहास पर ध्यान दिया जाए तो यहां से अंग्रेजों ने प्रथम बर्मा युद्ध की रणनीति तैयार की थी। गांव नदरई में भीमसेन बड़े जमींदार थे। इसके साथ ही बेहद जाबांज थे। उनकी जाबांजी का लोहा अंग्रेज भी मानते थे। भीमसेन को ब्रिटिश सेना की टुकड़ी की कमान सौंपी गई। इसी बीच वर्ष 1824 में प्रथम एंगलो बर्मी युद्ध में कॉगवांग राजवंश पर चढ़ाई की गई। इसमें भीमसेन की सैन्य रणनीति काफी असरदार साबित हुई थी। युद्ध को फतेह करने के दौरान कॉगवांग राजवंश के किले में लगे अष्टधातु के भारी वजन के घंटे को बतौर निशानी ब्रिटिश सेना ने अपने कब्जे में लिया था। इस भारी घंटे को भीमसेन के युद्ध कौशल से खुश होकर सेना ने इनाम बतौर यह घंटा सौंपा था। युद्ध की जीत के बाद भीमसेन ने इस भारी वजनी घंटे को कासगंज के नदरई गांव में भगवान शिव के मंदिर पर रख दिया था। घंटे पर बर्मी भाषा में जीत के शब्दों को उकेरा गया है।

हर साल लगता है नदरई पर मेला 
एंगलो बर्मी युद्ध में जीता गया भारी वजन के अष्टधातु घंटे को मंदिर पर रखा गया है। इस मंदिर पर साल में एक बार बाकायदा मेला भी लगता है। जिसमें भीमसेनके वंशज कानपुर से यहां आते हैं। कासगंज और नदरई के आसपास इलाके में इस मेले की काफी प्रसिद्धी है।  

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